Wednesday, June 3, 2020

जस्टिस रंजन गोगोई का गेम ओवर !

कांग्रेस अध्यक्ष- "राहुल गाँधी" 

पूर्व चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया "रंजन गोगोई" 

1) राहुल गांधी से कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट मे माफी मंगवाने वाले रंजन गोगोई खुद बने गंभीर अपराधों के आरोपी।
2) एक देशद्रोही को बचाने के लिए चीफ जस्टिस ऑफ़ इंडिया के पद का दुरुपयोग साबित।  रशीद खान ने दायर की क्रिमिनल केस. I.P.C. 409, 219, 201, 218, 220, 123, 120(B), 124 (A), 34 आदि धाराओं के तहत हो सकती है कार्यवाही।
3) रशीद खान ने स्टिंग ऑपरेशन की सीडी के साथ पेश किए ३५ आपराधिक साजिश और गुनाहो के सबूत।
4) नरीमन को बचाने के चक्कर मे बुरे फसे रंजन गोगोई और ऍड. दुष्यंत दवे।
5) ऑल इंडिया एस. सी., एस. टी. एंड मायनॉरिटी लॉयर्स एसोसिएशन, इंडियन बार एसोसिएशन, सुप्रिम कोर्ट एंड हाय कोर्ट लिटिगंटस एसोसिएशन द्वारा रंजन गोगोई, नरीमन, दीपक गुप्ता के खिलाफ कारवाई की मांग। 
6) हिंदू, मुस्लीम संगठनोने रशीद खान, ऍड निलेश ओझा और ऍड विजय कुर्ले को दिया समर्थन।
7) ममता बॅनर्जी की सांसद महुमा मोईत्रा का भी समर्थन. सुप्रीम कोर्ट की निंदा की।
8) आरोपीयो की गिरफ्तारी के लिए देशभर मे होंगे प्रदर्शन. जनता Cr.P.C. 43 के तहत खुद आरोपी को कर सकती है गिरफ्तार।
9) सेवा निवृत्त जज दीपक गुप्ता, और अन्य को अमेरिका, चीन और ISI के फंडिंग की जांच की मांग।

दिल्ली : विशेष संवाददाता :-
राहुल गांधी को कोर्ट अवमानना (Contempt of Court) मे माफ़ी मंगवाने वाले और महिला कर्मचारी के शोषण और उत्पीड़न के आरोपी पूर्व चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया रंजन गोगोई के चीफ जस्टिस के पद का दुरुपयोग एक देशद्रोही को बचाने के लिए करने के बहुत बड़े आपराधिक साजिश की पोलखोल होने से सुप्रीम कोर्ट और देश की राजनीति मे भूचाल आ गया है।  कई हिंदू-मुस्लिम संगठनो ने मामले की निष्पक्ष जांच  करने की मांग की है।

क्या है मामला:-
१२ मार्च २०१९ को न्या. रोहींटन नरीमन और न्या. विनीत सरन ने बिना किसी सुनवाई के आधार पर सीधे एक क्रिश्चन अल्पसंख्यक समुदाय के वकील एडवोकेट मैथ्यू नेदुमपरा को कोर्ट अवमानना का दोषी करार दे दिया. इस बात से वकील संगठनो में रोष व्याप्त हो गया।

इस देश के सविधान के मुताबिक कोई भी व्यक्ति को दोषी करार देने से पहले न्यायिक प्रक्रिया नुसार उसे नोटिस देना, आरोप निश्चित करना, बचाव का मौका देना, केस लड़ने के लिए वकील देना बंधनकारक है।

अजमल कसाब जैसे आतंकवादी को भी सभी सुविधा दी गयी थी. लेकिन एक अल्पसंख्याक समुदाय के वकील को व्यक्तिगत दुश्मन के चलते संविधान के खिलाफ जाकर दोषी करार दिए जाने के खिलाफ "इंडियन बार एसोसिएशन" के महाराष्ट्र और गोवा के अध्यक्ष एडवोकेट "विजय कुर्ले" और मानव अधिकार सुरक्षा परिषद् के राष्टीय सचिव "रशीद खान पठान" ने चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया के पास शिकायत दर्ज किया।
उन्ही दो जजो ने एक दूसरे मामले मे एक आरोपी को बचाने के लिए पद का दुरुपयोग कर गलत आदेश पारित करने को लेकर की थी उसमे भी जस्टिस नरीमन का भ्रष्टाचार और कानून की समझ ना होने के सबूत दिये गये थे. इसके साथ ही जस्टिस नरिमन के पिता जस्टिस फली नरिमन द्वारा भारतीय सेना, पुलिस और देश के खिलाफ पाकिस्तानी समर्थक आतंकवादियों को हिंसा के द्वारा भारत की बरबादी की लडाई में समर्थन देने के मामलें में भी सबुत दिए गए थे।
Adv. Nilesh Ojha
 National President
(Indian Bar Association)

Adv. Vivek Ramteke
Chairman

All India SC,  ST & Minority Lawyers Association


Rashid Khan Pathan
National Secretary
(Human Rights Security Council)


Adv. Vijay Kurle
Maharashtra State President
(Indian Bar Association)

इस शिकायत के आधार पर जस्टिस रोहिटन नरीमन और जस्टिस विनीत सरण की कार्यवाही तय मानी जा रही थी।  ज्ञात हो कि किसी भी व्यक्ति को गलत तरीके से सजा देने वाले जज को ७ साल की सजा का प्रावधान आय.पी.सी (I.P.C.) की धारा 220, 219 आदि में किया गया है। और सुप्रीम कोर्ट की संपत्ती का दुरुपयोग खुद के व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए करनेवाला जज आय. पी. सी. की धारा 409 के तहत आजीवन कारावास की सजा का हकदार है।

    उस कारवाई से बचने के लिए जस्टिस नरीमन ने एक साजिश के तहत उनके सहयोगी वकील मिलिंद साठे और कैवान कल्यानिवाला के हाथो एक पत्र बनवाकर खुद ही उसका संज्ञान लेकर खुद आरोपी रहते हुए खुद की ही केस में आदेश पारित कर शिकायतकर्ता को नोटिस जारी किया।

    कानून के मुताबिक आरोपी जज को खुद के केश में आदेश पारित करने का अधिकार नहीं है। ऐसी ही गलती करने वाले जस्टिस कर्णन के खिलाफ चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया ने डॉक्टरो की कमिटी बनाकर कही वो पागल तो नही है इसकी जाच करने की आदेश दिए थे. और बाद मे जस्टिस कर्णन को ६ महीने के लिए जेल भेज दिया था।

तबके चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के साजिश में शामिल होने के सबूत
जब १२ मार्च को जस्टिस नरीमन द्वारा वकिल के खिलाफ गैरकानूनी आदेश पारित किये गए थे तब सजा पर सुनवाई के लिए २७ मार्च २०१९ की तारीख तय की गयी थी.उस अत्याचार को रोकने के लिए इंडियन बार असोसिएशन द्वारा दिए गए २० मार्च २०१९ के पत्र पर रंजन गोगोई ने कोई कारवाई नही की और जस्टिस नरीमन को पद का दुरूपयोग करने दिया।

इस वजह से जस्टिस रंजन गोगोई Re:M.P. द्विवेदी (Dwivedi) AIR 1996 SC 2299 मामले में बनाये गए कानून के हिसाब से कोर्ट अवमानना के दोषी है।

बाद में जब रोहिटन नरीमन ने केस से खुद को अलग किया तब उस केस में नयी पीठ (बेंच) बनाने के लिए मामला तब के चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के पास आया।

          मामले की सुनवाई १० अप्रैल २०१९ को रखी गयी थी. लेकिन कुछ वरिष्ठ जजों ने नरीमन की गलती की वजह से केस लेने से मना कर दिया और CJI रंजन गोगोई को सलाह दी की मामले को ठंडे बस्ते में डाल दो नहीं तो जनता और वकील में आक्रोश फ़ैल जायेंगा और नरीमन के खिलाफ कारवाई करनी पडेगी। जस्टिस गोगोई ने मामले को ठन्डे बस्ते में डाल दिया। 10 अप्रैल को मामला बोर्ड पर नही आया।  जबकी चारो उत्तरवादी कोर्ट मे पहुच चुके थे।  बाद में कई महिने गुजर गए पर कोई भी समझदार, ईमानदार और वरिष्ठ जज केस लेने को तैयार नही हो रहा था। रशीद खान पठान, ऍड. निलेश ओझा ने खुद सुप्रीम कोर्ट के संबंधित असि. रजिस्ट्रार से और अन्य अधिकारीयों से मुलाकात की तो उन्हें बताया गया की २०१० का ऍड. प्रशांत भूषण का कंटेम्प्ट केस अभीतक प्रलंबित है इसलिए उनके केस के बाद आपका केस सुनवाई  को लिया जायेगा।

उसके बाद में २८ ऑगस्ट २०१९ को ऍड. फली नरीमन के देशद्रोह के अपराधों के बारे में और पी. चिंदबरम को गिरफ्तार होने की खबर दैनिक साहसिक में प्रकाशित हुई. एड. फली नरिमन ने इंडियन एक्सप्रेस में 16 फरवरी 2019 के प्रकाशित लेख में लोगों को भारतीय सेना, पुलीस और सरकार के खिलाफ और पाकिस्तान समर्थन में उकसाकर ऐसा करना गुनाह नहीं हैं यह समझाने की साजिश की. इसके खिलाफ इंडियन बार एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष एड. निलेश ओझा और मानव अधिकार सुरक्षा परिषद के राष्ट्रीय सचिव श्री. रशीद खान पठान ने शिकायत दर्ज कर एड. फली नरिमन को गिरफ्तार करने की मांग की और जैसे ही दैनिक साहसिक में 26 अगस्त 2019 को इसकी खबर छपी तो इससे नरीमन गैंग घबराकर तुरंत हरकत में आगई और चीफ जस्टिस रंजन गोगोई से मिलकर फली नरीमन को बचाने के लिए जस्टिस दीपक गुप्ता से बात कर २०१० के साल का ऍड. प्रशांत भुषन का मामला प्रलंबित होते हुये भी 2019 के मामले को बोर्ड पर लिया और सुनवाई २ सितम्बर २०१९ को तय की।

  यह बात गौर करने लायक है सुप्रीम कोर्ट की महिला कर्मचारी के शोषण मामले में की गयी साजिश में जस्टिस दीपक गुप्ता और जस्टिस नरीमन को भी आरोपी बनाकर गंभीर करवाई के लिए ऑल इंडिया एस. सी. , एस. टी एंड मायनॉरिटि लोयेर्स असोसिएशन के चेयरमैन एड. विवेक रामटेके द्व्यारा २७ मई २०१९ को राष्ट्रपति के पास दर्ज केस नं. PRESEC/E/2019/10201 अभी भी प्रलंम्बित है.
उस केस की Prayer Clause (1) इस प्रकार है।

“1. Direction for immediate consideration of  serious greviences of “Women in Criminal Law Association” dated 8th May, 2019 and direction  as per Constitution Bench Judgment in K. Veeraswami Vs. Union of India (UOI) and Ors.1991 (3) SCC 655, Raman Lal (High Court Judge)Vs. State 2001 Cri.L.J.800, Justice Nirmal Yadav case 2011 (4) RCR (Cri.) 809.  to register F.IR. Against Shri. Ranjan Gogoi, Chief Justice of India, Smt. Rupanjali Gogoi, Justice Rohinton Nariman &  Justice Deepak Gupta and Ors. under section 409, 217, 218, 219, 192, 466, 471, 474, 167, 166, r/w 120 (B) & 34 of Indian Penal Code by taking advice of competent, impartial Judges of Hon’ble Supreme Court as mentioned in para “60” of K. Veeraswami’s case 1991 (3) SCC 655,with direction to do investigation..’’

ऐसे में उसी आरोपी जस्टिस दीपक गुप्ता को दुसरे आरोपी नरीमन का केस देना अपने आपमें यह साबित करता है की कैसे सुप्रिम कोर्ट की संपत्ती का दुरूपयोग आरोपियों को बचाने के लिए किया गया।

२ सितंबर २०१९ को बेंच पर बैठते ही ७ सितंबर २०१९ को जस्टीस दीपक गुप्ता को अहमदाबाद मे परलीन ट्रस्ट जिसके डायरेक्टर दुष्यंत दवे है, वहापर फली नरीमन को बचाने के उद्देश से भाषण देने के लिए बुलाया गया।

वहां पर दीपक गुप्ता ने एड. फली नरिमन को बचाने के लिए भाषण देकर भारतीय सेना, पुलीस और सरकार के खिलाफ और पाकिस्तान का समर्थन करना गुनाह नहीं होता यह जताने का प्रयास किया।

बाद में उस जस्टिस दीपक गुप्ता ने आरोपी जस्टिस नरीमन और वकिल सिध्दार्थ लूथरा, मिलिंद साठे को बचाने के लिए झूठे सबुत बनाकर और संविधान पीठ के आदेशो के खिलाफ जाकर एड. फली नरिमन और जस्टिस रोहींटन नरिमन के अपराधों को उजागर करनेवाले दो वकील ऍड . निलेश ओझा, ऍड . विजय कुर्ले और मानवधिकार कायकर्ता श्री. रशीद खान पठाण को कोर्ट अवमानना की सजा सुनाई।
इस बारे में ऍड. निलेश ओझा ने न्यूज़ चॅनेलो को दिए अपने साक्षात्कार में जस्टिस दीपक गुप्ता की अकार्यक्षमता सुप्रीम कोर्ट के रिकॉर्ड की चोरी, जालसाजी उनके द्वारा पद का दुरूपयोग कर किए गये गंभीर अपराधो की जानकारी दी।
एडवोकेट फली नरिमन

न्या. रोहींटन नरीमन

जब वकीलों और नागरिको को जस्टिस दीपक गुप्ता के गुनाहों की जानकारी मिली तो वकीलों तथा नागरिकों में आक्रोश छा गया।
कई वकील संघटनो, गैर सरकारी संघटन, एन.जी.ओ ने  अपनी ओर से लिखित रूप में राष्ट्रपति, चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया, प्रधानमंत्री आदि को निवेदन देकर दोषी जजेस के खिलाफ तुरंत कारवाई की मांग की है।

ज्ञात हो की इससे पहले भी 10 जनवरी और 3 फरवरी 2020 को 'Suo Moto Contempt Petition 02 of 2020 Re: Vijay Kurle  & Ors.' मामले में सुप्रिम कोर्ट के करीब 500 वकीलों ने रशीद खान पठान और अन्य दोनों के समर्थन में वकालतनामा पेश किया था।  कोर्ट के हाॅल में जगह न होने की वजह से उन्हें बाहर रहना पड़ा था फिर भी करिब 148 वकीलों के नाम कोर्ट के आदेश में आ पाए  थे और वकीलों की इतनी भीड़ देख कर जस्टिस दिपक गुप्ता ने समय न होने का बहाना देकर सुनवाई टाल दी।

देश के इतिहास में इतने ज्यादा वकिल कभी किसी कोर्ट अवमानना की केस में उत्तरवादी की ओर से हाजिर नहीं हुए थे।
बादमे नरीमन लॉबी के लोगो ने ऍड. दुष्यंत दवे को मॅनेज कर २५ फरवरी 2020 को  S.C.B.A. की ओर से दीपक गुप्ता का वही भाषण फिर से रखवाकर वकीलो को गुमराह करने का प्रयास किया।  गौर करने की बात यह है की २ सितंबर २०१९ को फली नरीमन के समर्थन मे दीपक गुप्ता का भाषण रखने वाली ट्रस्ट (Pralin Charitable) के डायरेक्टर भी दुष्यंत दवे ही है।

    और बार एसोसिएशन के अध्यक्ष होते हुए भी एड. दुष्यंत दवे ने वकिल नीलेश ओझा, विजय कुर्ले के उपर हो रहे अन्याय पर कोई पत्र जारी नही किया. जबकी अन्य जजो के गैरकानूनी हरकतो पर हमेशा पत्र, लेख प्रकाशित करनेवाले दुष्यंत दवे जस्टीस रोहिंटन नरीमन और जस्टीस दीपक गुप्ता के जघन्य अपराधो पर चुप थे और दीपक गुप्ता को अप्रत्यक्ष मंच उपलब्ध करा रहे थे इससे उनकी भूमिका की भी इस आपराधिक साजिश मे उन्हे आरोपी बनाता हैं इसलिए जांच आवश्यक है।
एड. दुष्यंत दवे दीपक गुप्ता के साथ 

एड. दुष्यंत दवे और नरिमन ग्रुप की जाति वादी और राष्ट्रविरोधी मानसिकता साबित करणे के अन्य सबुत इस प्रकार हैं।
1) सुप्रीम कोर्ट के जज भुषण गवई कि सुप्रीम कोर्ट के जज के नियुक्ती के वक्त पर पुरे देश में केवल, नरिमन लॉबी के एड. दुष्यंत दवे ने ही विरोध किया था. उन्होंने जस्टिस गवई के खिलाफ कई बार पत्र लिखे. किंतु संगीन अपराध करणे वाले जस्टिस रोहिंटन नरिमन के खिलाफ कभी नहीं बोले।

2) दुसरे दलीत जज पी. डी. दिनाकरण के सुप्रीम कोर्ट जज के नियुक्ती के खिलाफ एड. फली नरिमन और एड. शांती भूषण ने विरोध किया. वह विरोध एक सुप्रीम कोर्ट के जज के उम्मीद्वार द्वारा प्रायोजित किया गया था. वह ब्लॅक मनी कितने सौ करोड्र में थी यह सी. बी. आई. और ई. डी. की जांच का विषय हैं।

3) गुजरात में भारतरत्न डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर की  जाति की जानकारी होते ही उन्हे सामान के साथ बाहर फेकने वाले इसी रोहिंटन नरिमन के रिश्तेदार थे जो इस बात को बडे गर्व से बताते हैं।  और हमेशा संविधान को मानने से इंकार करने के लिए नयी नयी तकनिक, झुठे केस लॉ बनाते रहते हैं।  सुप्रीम कोर्ट की संपत्ती का दुरूपयोग करते रहते हैं।

4) दलीत जज सी. एस. कर्णन को खुद के ही केस में आदेश पारित करणे पर यही नरिमन लॉबी टूट पडी थी और जस्टिस कर्णन के मानसिक स्वस्थता की जांच क्या ये पागल तो नहीं हैं ? इस कारण से करवाई गई। और उन्हे छह महिने की सजा दी गई।  परंतु वैसी ही गलती जस्टिस रोहिंटन नरिमन ने 27 मार्च 2019, 12 मार्च 2019 को की और खुद ही आरोपी रहते हुए खुद ने ही जज बनकर आदेश पारित किए।

तो एड. दुष्यंत दवे चुप क्यू रहे? क्या इस देश में एड. दुष्यंत दवे का कानून जाति देखकर बदलता हैं? भारतीय संविधान की धारा 14 कानून के आगे सब समान क्यो नहीं मान रहें?
देश की जनता को बार बार मूर्ख नही बनाया जा सकता !

5) जिस कानून के तहत बाल ठाकरे को (2005) 1 SCC 254 में बरी किया जाता है उसी पूर्ण खंडपीठ के आदेश को निचली खंडपीठ के दीपक गुप्ता मानने से मना कर अल्पसंख्यक समुदाय के श्री. रशीद खान पठान को और दो वकीलों को सजा सुनाते हैं तब एड. दुष्यंत दवे चुप बैठते हैं और उसी दीपक गुप्ता का रिटायरमेंट का फेअरवेल आयोजित कर उसकी तारीफ करते है।

6) ज्ञात हो की जस्टिस दीपक गुप्ता भी दलितों को सुप्रीम कोर्ट जज बनाने के आरक्षण का विरोध दि. 8 मई 2020 को इंडियन एक्सप्रेस में दर्ज कराता हैं।
इससे इस लॉबी की असलीयत पता चलती हैं।

जस्टीस दीपक गुप्ता के 35 अपराध :-
    कानून के मुताबिक आरोपी जज को खुद के केश में आदेश पारित करने का अधिकार नहीं है. ऐसी ही गलती करने वाले जस्टिस कर्णन के खिलाफ चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया ने डॉक्टरो की कमिटी बनाकर कही वो पागल तो नही है इसकी जाच करने की आदेश दिए थे. उनके सारे आदेश रद्द कर दिए गए. उनसे कोर्ट के सारे काम निकाल लिए गए. और बाद मे जस्टिस कर्णन ६ महीने के लिए जेल भेज दिया था. किंतू वैसा ही गुनाह करणेवाले जस्टिस नरिमन के खिलाफ कोई कारवाई न करते हुए उनके उसी गुनाह को जस्टिस दिपक गुप्ता की Smaller Bench ने सही ठहराने का प्रयास किया जो संविधान पीठ के आदेशों के खिलाफ हैं।

जस्टिस दिपक गुप्ता ने अपने 27 एप्रिल 2020 के आदेश मे माना की ऍड. विजय कुर्ले ने जस्टिस नरिमन के खिलाफ ढेर सारे लिखीत दस्तावेजो के सबूत पेश किए. किंतू वे सबुत क्या थे इस बात का जिक्र आदेश मे नही किया. उस सबूतो मे जस्टिस नरिमन और एड. मिलींद साठे के कार्यक्रम के फोटोग्राफस और सुप्रिम कोर्ट के रजिस्ट्रार द्वारा दिए गए लिखीत सबूत थे और कई महत्वपुर्ण दस्तावेज थे जिससे जस्टिस नरिमन की आपराधिक साजिश उजागर हो रही थी।

जब 4 मई 2020 को उत्तरवादीयो ने यह मुद्दा उठाया की कोर्ट ने उनके दस्तावेज देखे ही नही और सबूतो के खिलाफ जाकर झूठी बात लिखकर आदेश पारीत किए है तो जस्टीस दीपक गुप्ता ने वह दस्तावेज कोर्ट रिकॉर्ड से नष्ट करवा दिए और उनकी साजिश मे ऍड. सिद्धार्थ लुथरा भी शामिल है ऐसे सबूत रशीद खान पठाण ने चीफ जस्टीस ऑफ़ इंडिया को अपनी शिकायत के साथ पेश किए है।

ऍड. सिद्धार्थ लुथरा

जस्टीस दीपक गुप्ता का और दुसरा झुठ कोर्ट रिकॉर्ड से ही साबित हो गया. उत्तरवादी क्र. 3 ऍड. नीलेश ओझा ने जस्टीस दीपक गुप्ता को मामले की सुनवाई से हटने के लिए Recusal Application I.A. No. 48502 of 2020 दाखिल किया उसमे कुल 23 मुद्दे थे. जिसमे जस्टीस दीपक गुप्ता द्वारा उत्तरवादीके वकीलो को धमकाना, झूठे सबूत बनाना, रजिस्ट्रार की रिपोर्ट और चीफ जस्टीस ऑफिस के रिकॉर्ड के खिलाफ जाकर झूठी बाते आदेश मे लिखना, संविधान पीठ के आदेशो को मानने से मना करना, खारीज हो चुके (overruled) आदेशो के तहत गैरकानूनी आदेश परीत करना, संविधान के कलम 14 का उल्लंघन करते हुए भेदभावपूर्ण व्यवहार करना, आरोपी ऍड. सिद्धार्थ लुथरा को बचाने का प्रयास करना आदी आरोप थे।

लेकिन जस्टीस दीपक गुप्ता ने अपने 04.05.2020 के आदेश मे झूठ लिखा की वह अर्जी केवल एक ही मुददे पर दाखिल की गयी है की जस्टीस दीपक गुप्ता केस मे जल्दबाजी कर रहे है।
यह झुठ सुप्रीम कोर्ट की वेबसाईट पर इस I. A. No. 48502 of 2020  को डाऊनलोड करके देखा जा सकता है।
दुसरा बडा झुठ ऐसा लिखा है की चुकि उत्तरवादियोने 27 एप्रिल 2020 के पहले ऐसा कोई ऑब्जेक्शन नही लिया की उन्हे अपना पक्ष रखने का पुरा मौका नही मिला ( Fair Hearing ), इसलिए 27 एप्रिल 2020 का आदेश वापस लेने  Recall of order की अर्जी नही सुनी जा सकती Review पुर्नविलोकन की अर्जी करनी होगी।

इस बात का झूठ इससे ही साबित हो गया की 16 मार्च 2020 को तीनो उत्तरवादियो ने लिखीत रूपमे अपना (objection) विरोध दायर किया था कि उन्हे अपनी बात रखने का मौका नही दिया गया इसलिए मामले की पुनः सुनवाई की जाए।
इन अपराधो के अलावा जस्टीस दीपक गुप्ता और अन्य लोगो ने अपराधिक साजिश कर किए गए 35 गुनाहो की लिस्ट पुरे सबूतो के साथ चीफ जस्टीस ऑफ इडिया को सौपी गई है।

झुठे  सबूत बनाकर गैरकानूनी आदेश पारीत करने, कोर्ट की संपत्ती का दुरूपयोग करने, कोर्ट के रिकॉर्ड से सबूत नष्ट करने, झुठे सबूत बनाकर उन्हे सच्चे सबूत दिखाकर गैरकानूनी आदेश पारीत करनेवाले  जज और उनकी इस साजिश  मे  उनका साथ देनेवाले ऍड. सिद्धार्थ लुथरा जैसे वकिलो को आय. पी. सी. की धारा  409, 167,  192, 193, 201, 218, 219, 220, 211, 469, 471, 474 r/w 120(B), 34, 109 के तहत कठोर सजा का प्रावधान है. हाल ही मे जस्टीस निर्मल यादव के खिलाफ सी. बी. आय ने चार्ज-शीट दायर की थी. [Mrs. Nirmal Yadav Vs. C.B.I. 2011 (4) RCR (crl.) 809]

दिल्ली हाई कोर्ट के जज शमीत मुखर्जी ऐसे ही मामले मे गिरफ्तार हुए थे. [Shameet Mukherjee Vs. C.B.I. 2003 SCC OnLine Del 821] ऐसे जज और सरकारी वकिलो को भी गिरफ्तार कर चार्ज शीट भेजा गया था. [K. Rama Reddy 1998 (3) ALD 305, Kamlakar Bhavsar 2002 All MR 2269,  Govind Mehta AIR 1971 SC 1708]

ममता बॅनर्जी की लोकसभा सांसद महुमा मोईत्रा ने भी श्री रशीद खान पठाण, एड. निलेश ओझा और एड. विजय कुर्ले के मामले में दिए गए आदेश की कडी निंदा की हैं।

अपने 29/04/2019 के लेख में उन्होंने लिखा की सुप्रिम कोर्ट यह कंन्टेम्प्ट कोर्ट नही हैं यह हक की रक्षा करनेवाला हैं. (Supreme Court is not a Court of Contempt, but a court of Right.) उन्होंने लिखा की रशीद खान पठान ने सुप्रिम कोर्ट को बंधक बनाया कहने से बेहतर होगा की नागरिको के अधिकारो को बंधक बनाने के मामले में सुप्रिम कोर्ट मुक दर्शक बना पडा हैं।
जस्टिस रंजन गोगोई का गेम ओवर !
सेवा निवृत जज "दीपक गुप्ता"

देशद्रोह और अपराधी क साजिश के मामले मे स्पष्ट कानून बनाया गया हैं और इव्हीडेंस एक्ट में सेक्शन 10 में
स्पष्ट प्रावधान हैं की अगर देशद्रोहियों और राष्ट्रविरोधी ताकतों के समर्थन अगर कोई व्यक्ती हिंसा को बढावा देने के उद्देश से कोई लेख प्रकाशित करता हैं या करवाने में मदत करता हैं तो वह व्यक्ति भी देशद्रोह का आरोपी हैं।
सेक्शन 120 (B) ऑफ आई. पी. सी. मे एक जज को आरोपी बनाते समय सुप्रीम कोर्ट ने Raman Lal Vs. State 2001 Cr.L.J. 800 में स्पष्ट किया की ऐसी साजिश करने वाले आरोपी परदे के पीछे से खेल सकते है उनकी हरकतो से तथा उनके द्वारा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष समर्थन के आधार पर उन्हे आरोपी बनाना चाहीए।  स्पष्ट सबुत की आवश्यकता नहीं हैं।  ऐसा ही कानून Navjot Sandhu (2005) 11 SCC 600, Ram Narain AIR 2003 SC 2748, C.B.I. Vs. Bhupendra 2019 SCC OnLine Bom 140 में बनाया गया हैं।

जो व्यक्ती अपनी हरकतो से आरोपियों/देशद्रोहीयों को फायदा पहुचाने के लिए कार्य करता हैं या उसे रोकने की जिम्मेदारी होते हुए भी चुप रहकर देशद्रोहीयों को अपने गैरकानूनी अपराधिक साजिश को अंजाम में पहुचने का रास्ता सुलभ करता हैं वह भी मुख्य अपराधी के बराबर ही उम्रकैद की सजा का हकदार है।


Mursalin Shaikh
Secretary
Supreme Court & High Court Litigants Association
Shaikhmursalin3119@gmail.com

Justice (Retd.) Deepak Gupta, Ad. Dushyant Dave and Adv. Fali Nariman are liable to be arrested soon as co-accused in JNU sedition case


New Delhi :- In a crucial development,  the Chairman of All India SC, ST and Minority Lawyers’ Association has written to Delhi Police Commissioner to invoke the provisions of section 173 (8) of Cr.P.C. in the chargesheet filed in Kanhaiyya Kumar’s case  and to add Adv. Fali Nariman and Justice (Retd.) Deepak Gupta as co-accused as per section 120 (B) of I.P.C. as the speech delivered by them is also a part of offence as per section 10 of Evidence Act.

The background of the case is that in 2016, some anti-national elements of JNU had raised following slogans against Indian Army, Police and in support of Pakistan.

*Bharat ki barbadi tak Jung Rahegi, Jung Rahegi

Indian Army Murdabad

Bharat tere tukdae honge Insha Allah Insha Allah.

Bandook ki dum pe lenge Aazadi.”*

The Delhi Police had registered a case of sedition against the wrong doers under section 124-A and 120(B) of Indian Penal Code and the whole nation had stood up in support of Indian Army.

Then, in order to support the act of raising anti-national slogans and demoralize Indian Army and police, Adv. Fali Nariman authored an article, which was published in Indian Express on 17.02.2016 titled ‘A test of freedom: ‘To be anti-Indian’ is not a criminal offence, and it is definitely not sedition’. Upon publication of this article, Adv. Nilesh Ojha had lodged a complaint with Mumbai Police on 19.02.2016.

Thereafter, on 19.02.2019, another complaint was filed against Adv. Fali Nariman and Mr. P. Chidambaram, by Shri. Rashid Khan Pathan, National Secretary of Human Rights Security Council. This complaint was marked to Hon’ble President of India, Hon’ble Prime Minister of India and several other authorities including the Chairman – Bar Council of India.

The Additional Secretary, Registrar D.C. – Bar Council of India had forwarded the above said complaint to The Secretary – State Bar Council of Delhi for taking appropriate action against Adv. Fali Nariman and Mr. P. Chidambaram. A copy of this letter dated 19.03.2019 was sent to Mr. Rashid Khan Pathan too.

On 20.08.2019, The Delhi High Court denied interim protection from arrest to Mr. P. Chidambaram who had to then fact arrest by the CBI and ED.

On 28.08.2019, an article was published in ‘Dainik Sahasik’ regarding Rashid Khan Pathan’s demand for arrest of Adv. Fali Nariman. The publication of this news sent jitters to the ‘Nariman group’ who immediately approached the then CJI Mr. Ranjan Gogoi and requested him to start the hearing of the case of contempt against Rashid Khan Pathan and others (Suo Motu Contempt Petition (Criminal) No. 2 of 2019 – RE: VIJAY KURLE & ORS).

In fact, the case of Adv. Prashant Bhushan in Suo Moto Contempt is pending since 2010, which, as per the law, should have been heard and decided first. But under the influence of Nariman group, CJI Shri. Ranjan Gogoi listed the matter of year 2019 out-of-turn. Such as out-of-turn hearing is violative of Article 14 of the constitution and CJI is answerable to it. In A.V.Amarnath Vs. The Registrar ILR 1999 KAR 478, it is ruled as under;

“……But it needs to be stressed here that the exercising of the said power by the Chief Justice by deviating from the normal rule based on the regular practice of the Court (See AIR 1974 SC 2269, para 6) or the statutory provisions must stand the test of reason and objectivity since such exercise will be always subject to mandates of Article 14 of the Constitution of India which absolutely prohibits the exercise of powers in a discriminatory, arbitrary or mala-fide manner and always entitle the aggrieved party to seek remedy against the same by approaching the appropriate forum.”

Justice Deepak Gupta was in the Bench constituted to hear the case related with Narimans (Adv. Fali Nariman and Justice Rohinton Nariman).

In fact, Justice Deepak Gupta per se was disqualified to hear the said case as he was co-accused along with Justice Rohinton Nariman and Justice Ranjan Gogoi in the case of lady staffer's harassment case and a written complaint dated 27.05.2019 being case number PRSEC/E/2019/10201 was pending before Hon'ble President of India. But as part of conspiracy he accepted the assignment and misused the Supreme Court machinery for their personal and ulterior purposes.

Thereafter due to mounting pressure from public and media, there was a strong possibility of anti-national Adv. Fali Nariman getting arrested. There was hardly anyone who sympathized and supported Adv. Fali Nariman. At that time, some anti-national gang members persuaded Mr. Deepak Gupta and facilitated the workshop (organised by the Praleen Public Charitable Trust and Lecture Committee in Ahmedabad) conducted on 7th September 2019, where Mr. Deepak Gupta, out of blue, chose to deliver speech on Sedition laws and freedom of speech in India. This was a pernicious attempt to gather support for the views expressed by Adv. Fali Nariman. Mr. Deepak Gupta, by delivering speech on this topic, especially when there was no obvious occasion for choosing the topic of sedition laws, had overtly instigated the public to support Pakistani Army against our Indian Army, police and Government.

It is further interesting to note that the same Judge Deepak Gupta has been found to be involved in committing theft of Supreme Court records in order to save co-accused Adv. Fali Nariman and his son Justice Rohinton Nariman. Also Justice (Retd.) Mr. Deepak Gupta is found to be creating false evidences, disobeying and ignoring the Constitution of India and judgments of constitution benches and Larger benched of the Supreme Court.

This was done by Mr. Deepak Gupta to silence the complainants Shri. Rashid Khan Pathan, Adv. Nilesh Ojha and Adv. Vijay Kurle who were pursuing different case against Adv. Fali Nariman anf Justice Rohinton Nariman.

A Complaint along with documentary proofs like letters by Registrar of Supreme Court and a Sting operation CD is submitted to Hon’ble Chief Justice of India by Shri. Rashid Khan Pathan on 31.05.2020, with a prayer to investigate the 35 charges of serious Criminal offences committed by Justice (Retd.) Deepak Gupta and his syndicate. The Complainant has prayed for registration of F.I.R. under Section 409, 167, 192, 193, 201, 211, 218, 219, 465, 466, 471, 474, r/w 120(B), 34 & 109 of IPC.

The informant has also pointed out for the need to administer Narco Test, Brain Mapping and Lie Detector Test on Justice (Retd.) Deepak Gupta, Adv. Fali Nariman and Adv. Siddharth Luthra, to unearth the complete conspiracy of anti-national elements and their corruption, including the purchase of Benami Properties worth hundreds of crores, from the black money received from ISI and other agencies.

As per section 10 of the Evidence Act and section 120 (B) of IPC, the accused Justice (Retd.) Deepak Gupta and Adv. Fali Nariman are liable to be made co-accused in the main sedition charge sheet.

Since the offence is punishable up to life imprisonment and non-bailable, the accused are liable to be arrested forthwith. As per provisions of section 43 of Cr.P.C., any citizen can arrest them and handover to the police.

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